दिल के गुलिस्ताँ

दुनिया की दिवारों में,सपनों के गुलिस्ताँ हैं।                           ख्वाइशों की कलियाँ हैं,उम्मीदों की खुशबू हैं॥

दर्द हो जब जख्मों में,फिर भी मुस्कुराना हैं।                        जख्मों से क्या डरना,अपने ही तो देते हैं॥

खुशियों की मंजिल की,दर्द भरी राहे हैं।                        हमसफर हम सा हो,राह कट जाना हैं॥

रंज क्या है अपनो से,दर्द भरे रिश्ते हैं।                                रूठे-रूठे रहते हो,झूठे-झूठे झगड़े हैं॥

वक्त के फेरों मे,जीवन बंध जाना हैं।                                 रिश्तों में बंधा जीवन,किश्तों में जीना हैं॥

घायल हो परिन्दे,फिर भी उड़ते जाते हैं।                           घायल हो मन जब,क्यों जीवन हार जाना हैं॥

दुनिया की दिवारों में,सपनों के गुलिस्ताँ हैं।                       ख्वाइशों की कलियाँ हैं,उम्मीदों की खुशबू हैं॥

“लीला”

जीवन में कुछ छोटी-छोटी घटनाएँ ऐसे घट जाती है कि जो जीवनभर की उठापटक में भी,मन के किसी कोने में छिपी हुई बैठ रहती है।समय का अदृश्य पंछी अपने पंखों में जीवन के,न जाने कितने ही किस्से,सपने और आशाओं को समेटता हुआ अनंत की ओर उड़ता जाता है। शेष रहती है तो यादें जो मन में परत-दर-परत जमा होती जाती है। ऐसी ही कुछ परतें मेरे मन में भी जमी हुई है जिनमें कहीं दबा हुआ है मेरा बचपन। 

    उन दिनों हम हमारे शहर बीकानेर के एक मौहल्ले हनुमानहत्थे में रहा करते थे। माँ रोज सुबह मुझे नहला-धुलाकर तैयार करती,आँखों में काजल डालती और मेरे माथे के दाहिनी ओर थोड़ा ऊपर की तरफ एक काला टीका लगादेती थी ताकि मुझे किसी की नज़र न लगे। फिर मेरे स्कूल के बस्ते में स्लेट और बर्ता रखकर मेरे टिफिन में मीठा पराठां रखती और टिफिन मेरे बस्ते में रखकर मुझे स्कूल छोड़ने जाती थी।

  मैं मौहल्ले की ही एक स्कूल में पढ़ता था। वह स्कूल एक बाड़े नूमा स्थान था, जंहा एक कोने में एक छप्पर था जो स्कूल का आफिस था। स्कूल में अनेक पेड़ थे, जिनकी छांव में कक्षाएं लगा करती थी। नीम के पेड़ के नीचे पाँचवीं तो खेजड़ी के नीचे छट्ठी कक्षा, शीशम के पेड़ के नीचे सातवीं और आठवीं कक्षा, व बेरी के नीचे तीसरी और चौथी कक्षा तथा बबूल के पेड़ के नीचे पहली और दूसरी कक्षाएं लगा करती थी। और बैठने के लिए दरी बिछाई जाती थी। मैं चौथी कक्षा का विद्यार्थी था। हम तीसरी-चौथी के विद्यार्थी अपने आप पर गर्व किया करते थे क्योंकि बेरी का पेड़ और उसकी छायां हमारे हिस्से में थी। जब बेर का मौसम आता तब हमारी कक्षा की छत हरे,पीले, लाल रसीले बेरों से लद जाती, जब रस और बढ़ जाता, तो वे रसीले बेर हमारी गोद में झरने लगते मानों ईश्वर अपना प्रसाद,सीधे ही आसमान से हमारी झोली में डाल रहे हैं। इस कारण अन्य कक्षाओं के छात्रों, हमारी कक्षा के छात्रों से ईर्ष्या करते थे। ईर्ष्या करते भी तो क्यों नही? जहां तक बस चलता,हम उन्हें हमारी बेरी के बेर खाने ही नहीं देते थे। बेर उन्हें दिखा-दिखा कर खाते थे और तरह-तरह का मुँह बनाकर उन्हें चिड़ाते थे,किंतु अंतमें अध्यापकों का हस्तक्षेप होता और बेर सभी में बराबर बांटने पड़ते। उस बेरी के पेड़, उसकी छायां और उसके फलों पर हम अपना एकाधिकार समझते थे।  जब नीम के पेड़ पर निम्बोली पकती तब पाँचवीं कक्षा के छात्र हमें नीम के पेड़ के पास से भी न गुजरने देते।   कुछ इसी तरह का व्यवहार छठी कक्षा के छात्रों का होता था, जब खेजड़ी पर सांगरियां पक कर पीली पड़ जाती थी। 

एक अद्भुत सा लगाव था हमें उन पेड़ों से,वो हमारी जीवंत कक्षाएं थी।

स्कूल पिछले हिस्से में बच्चों के लिये खेलने का मैदान था, उसके एक कोने कुछ झाडियाँ थी, जहाँ कुछ दिनों से एक कुतिया ने अपना घर बसाया था। जब आधी छुट्टी होती और हम अपना टिफिन निकालकर खाना खाने लगते,तो वो कुतिया टांगों में पूंछ दबाए,भोली सी सूरत बनाकर हमारे आसपास घूमने लग जाती, रोटी का टुकड़ा फेंकते ही उसे चट कर जाती और फिर ललचाई आँखों से हमें देखती रहती थी। चाहे किसी से उसे खाना मिले या न मिले या दुत्कार मिले किंतु उसकी आँखों में कृतज्ञता का ही भाव नज़र आता था। हमारी बाल मंडली ने कुछ ही दिनों में उसका नामकरण कर दिया। उसका नाम रखा गया “लीला’ जब हम खेलते तो वह हमारे बीच उच्छलती-कूदती, हमारे साथ दौड़ती। लीला को मुझसे कुछ ज्यादा ही लगाव हो गया,मैं उसे माँ के हाथ का बना आधा परांठा खाने को देता था। शायद माँ का वह प्रेम ही उसे मेरी तरफ खींच रहा था। जब मैं स्कूल आता वह सामने से दौड़कर आती,कभी मेरे पैरों को चाटती, तो कभी पिछले दोनों पैरों पर खड़ी होकर मेरे मूँह तक अपने मूँह को लाती। पूरी छुट्टी होने पर स्कूल की गली के नुक्कड़ तक वह मेरे पीछे आती थी, उससे आगे दूसरी गली के कुत्तों का साम्राज्य था, जहाँ से लीला का गुजरना नामुमकिन था।

एक दिन सुबह स्कूल पहूँचा तो लीला कहीं भी दिखाई नहीं दी। आधी छुट्टी तक एक बार भी नजरों के सामने नहीं आयी। मुझे और मेरी मित्रमंडली को उसकी चिंता हुई और हमने तय किया कि आधी छुट्टी में लीला को ढूँढा जाये। आधी छुट्टी में हम लीला को ढूँढने निकले तो सबसे पहले हम पीछे के मैदान में उस स्थान पर पहुँचे जँहा लीला रहती थी,वो स्थान था मैदान के एक कोने में उगी झाड़ियाँ। जब हम झाड़ियों के नजदीक पहुँचे तो “कूँ-कूँ’ की आवाज़ सुनाई दी, वह आवाज उन्हीं झाड़ियों में से आ रही थी,हम सहम गये,धीरे-धीरे बिना शोर किए हम झाड़ियों के और नजदीक पहूंचे,मैंने हिम्मत करके झाड़ियाँ हटाई और जो देखा,उससे हमारे आशचर्य और खुशी ठीकाना ही नहीं रहा। लीला अपने गुफा नुमा खड्डे में लेटी हुई थी और चार प्यारे-प्यारे, छोटे-छोटे पिल्ले उस पर उच्छल-कूद कर रहे थे। हम खुशी के मारे चिल्लाने लगे और पिल्लों को उठा लिया, उन से खेलने लगे तभी स्कूल के चपरासी “आसू जी’ दौड़ते हुए आए और डांटकर कहने लगे कि “बच्चों दूर भागो। कुतिया रात को ही ब्यायी है, इसके बच्चों को छेड़ोगे तो काटेगी । मैंने चौंक कर एक नजर लीला की ओर देखा। लीला की आँखों में किसी भी तरह का कोई विरोध या क्रोध नजर नहीं आया,वह अपने बच्चों को हमारे हाथों में देखकर सुरक्षित और आश्वस्त लग रही थी। परंतु आसू जी के आगे हमारी एक न चली। हमें पिल्लौं को वहीं छोड़कर जाना पड़ा। थोड़ी देर में जब आसू जी वंहा से चले गये तब हम अपने-अपने टिफिन से रोटी लेकर वहां वापस आगये और रोटियों को लीला के सामने रख दिया,लीला तुंरत उन रोटियाँ को खाने लगी और हम उसके बच्चों के साथ खेलने लगे तभी आधी छुट्टी समाप्ती की क्रूर घंटी बज उठी। हमे मन मारकर कक्षा में जाना पड़ा। अब यह क्रम नित्य शुरू हो गया, हम मौका मिलते ही लीला और उसके बच्चों के साथ खेलने लगते, कभी उनको गोद में लेते तो कभी उनके पीछे दौड़ते कभी इधर-उधर से ईंट पत्थर इकट्ठे कर उनके लिए घर बनाते। अब हम टिफिन में ज्यादा खाना लाने लगे थे, क्योंकि अब लीला के बच्चे ने भी रोटी खाना शुरू कर दिया था। अब लीला के बच्चे भी हमें देखते ही हमारी तरफ पूँछ हीलाते,झूमते और दौड़ते हुए आते, कभी हमारी पैंट अपने दाँतों से पकडते,तो कभी हमारे पैर चाटते। उनके साथ खेलते वक्त आसू जी का भय भी बना रहता, आसू जी जब डांटते तब हम दौड़कर कक्षा में आ जाते और आसू जी के वहाँ से हटते ही हम वापस लीला के बच्चों के साथ खेलने लग जाते थे। अब स्कूल में हमारा खाली समय लीला के आसपास ही बीतने लगा। 

समय का पहिया कब रूकने वाला था। कुछ ही दिनों में हमारी वार्षिक परीक्षा शुरू हो गई और कुछ ही दिनों में समाप्त हो गई। फिर शुरू हुई गर्मियों की “छुट्टियां’ जो सभी बच्चों के लिए मौज-मस्ती के दिन होते है, सो मैं कैसे पीछे रहता, मैं भी अपनी गली मुहल्ले के बच्चों के साथ खेलता, मौज-मस्ती करता।

अक्षय तृतीया हमारे शहर का स्थापना दिवस है इस के उपलक्ष्य में इस तिथि को हमारे शहर में पतंग उड़ाने का रीवाज है , सो मैंने भी इस दिन पतंग उड़ाने का भरपूर आनन्द लिया। अक्षय तृतीया के अगली ही शाम को मैं अपने परिवार के साथ अपने पुश्तैनी गाँव के लिये रवाना हो गया। गाँव में दादा-दादी,बुआ, चाचा का भरपूर स्नेह मिला। दूध-दही की कोई कमी नहीं थी हमारे घर में। दादी रोज मुझे अपने पास बैठाकर मक्खन खिलाती थी। चाचा ऊँट की सवारी करवाते। सारे दिन खेल-कूद के सिवाय और कुछ नज़र ही नहीं आता था। बड़े ही आनन्द से दिन गुजर रहे थे मेरे। इस तरह से कब छुट्टियां खत्म हो गई पता ही नहीं चला। अगले ही दिन हम बीकानेर के लीए रवाना हो गए और रात तक बीकानेर पहुंच गए। रात को सोते वक्त न जाने कहां से स्कूल की स्मृतियों ने आकर घेर लिया, स्कूल के पेड़, सहपाठी, अध्यापक, लीला और उसके बच्चे सभी याद आने लगे,उनके चहरे आँखों के सामने घूमने लगे। फिर न जाने कब आँख लग गई। अगले दिन सुबह माँ ने जल्दी उठा दिया और कहने लगी “आज नई कक्षा का पहला दिन है इसलिये जल्दी तैयार होकर समय से कुछ पहले ही स्कूल पहुंचना है’। माँ ने मुझे जल्दी ही तैयार कर दिया और स्कूल के दरवाजे तक मुझे छोड़कर वपिस लौट गई। जैसे ही मैंने स्कूल में पैर रखा,”मैं’ अचम्भित हो गया। दो महीनों की छुट्टियों में इतना परिवर्तन ! विकास की लहर अब हमारे स्कूल तक पहुँच चुकी थी, पुरानी कक्षाओं की जगह सीमेंट और ईंटों के नये भवन लगभग तैयार थे। वो पेड़ जो हमारी जीवित कक्षाएं थीं,काट दिये गए थे। सिर्फ नीम का एक पेड़ ही शेष बचा था,जो शायद आधुनिक निर्माण में कहीं बाधक नहीं रहा होगा। वह नये बने शौचालय के पीछे खड़ा ऐसे लग रहा था मानो किसी दुर्घटना में खत्म हुए परिवार का अकेला सदस्य बचा हो। 

 इस विकास के प्रवाह को देखकर मुझे लीला की चिंता होने लगी,मैंने तुरंत पीछे के मैदान में जाकर देखा,वंहा अब बास्केटबाल का कोर्ट बनगया था, “खो-खो’ के मैदान के लिए जमीन। समतल की जा रही थी। वहां लीला और उसके बच्चे दिखाई नहीं दिये, तभी आसू जी दिखाई दिये, “मैं ‘ दौड़कर उनके पास पहुंचा, मुझे देखकर वह मुस्कुराने लगे, मेरा प्रश्न वह पहले ही भांप गये थे। उनके निकट पहुँते ही वो बोले “बेटा उस कुत्ती और उसके बच्चों को ढूँढ रहे हो, अब वो तुझे नहीं मिलेगें, अभी कुछ दिनों पहले ही जब पीछे के मैदान का काम शुरू हुआ तब ठेकेदार के मजदूरों ने उस कुत्ती और उसके बच्चों को यहाँ से निकाल दिया। उस रात बारिश शुरू हुई तो रूकने का नाम ही नहीं ले रही थी। क्या नाम रखा था तूनें उस कुतिया का? हाँ,”लीला’। लीला गली में खड़े एक ट्रक के नीचे अपने बच्चों को लेकर घुस गई, शायद ट्रक के पहिये के आसपास ही कहीं रहे होंगे वो पिल्ले और कुतिया। देर रात कब ट्रक रवाना हुआ पता नहीं, कैसे वो कुतिया और उसका सारा परिवार ट्रक के चपेट आया इसका भी सही पता नहीं पर सुबह उनके कुचले हुए शरीरों को सड़क पर मैंने देखा था’। आसू जी की बात सुनकर मेरी आँखें सजल हो आई। मैं दौड़कर अपनी नई कक्षा के भवन में आ गया और एक कोने बैठ कर रोने लगा,तबतक मेरे अन्य सहपाठी भी स्कूल आचुके थे। सबने घेर कर मेरे रोने का कारण पूछा तो मैंने आसूजी से सुना वृतांत उन्हें कह डाला और उन सब की आँखें भी भर आई। 

 समय के साथ,विकास और आधुनिकता भी आवश्यक है,परंतु आधुनिकता और विकास के मार्ग पर न जाने कितने बेजुबानों की बली चढती है ,यह आज प्रत्यक्ष हुआ।

फूल मुस्कुराए

अक्सर बाज़ारों में, गलियों में, शहर में नालीयों के किनारे कुछ पौधे  देखने को मिल जाते हैं जो दिखने में मृत से,अपनी शोभा खोये हुए  से लगते है। परन्तु मौसम के अनुकूल होते ही, बसन्त के आने पर अपनी पूरी ताकत लगाकर खुद की शोभा संजोने का वे प्रयास करते हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी फूलों को मुस्कुराते हुए मैने देखा है। आपने भी जरूर देखा होगा। तो फिर हम भी विपरीत परिस्थितियों में इन पौधों से मुस्कुराना क्यों न सीखें।​

आधा यौवन

आधी-आधी रातें,                                                       आधे-आधे दिन।                                                      आधी-आधी बातें,                                                      आधे-आधे मन।।

आधी-आधी कलियाँ,                                                   आधे-आधे फूल।                                                      आधी-आधी खुशबू,                                                   आधे-आधे शूल।।

आधी-आधी खुशियां,                                                आधे-आधे गम।                                                      आधी-आधी आशा,                                                   आधे-आधे हम।।

आधी-आधी जिंदगी,                                                   आधे-आधे ख्वाब।                                                   आधी-आधी ख्वाहिशें,                                                आधे-आधे जवाब।।

आधी-आधी मंजिले,                                                   आधे-आधे रास्ते।                                                     आधी-आधी कोशिशें,                                                 आधे-आधे वास्ते।।

आधी-आधी राधा,                                                     आधे-आधे मोहन।                                                    आधी-आधी दिल्लगी,                                                आधे-आधे यौवन।।

भारतीय संस्कृति में एकात्म मानवता

विश्व में अनेक विचारधाराएँ,जीवन पद्धतियाँ और सिद्धांत समय-समय पर प्रतिपादित होते रहे हैं। इनके उत्पन्न होने में कुछ देशों की तत्कालीन परिस्थितियां ही मुख्य कारण रही। जैसे रूस की क्रान्ति,ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति,फ्रांस की क्रांति आदि के द्वारा ही पूंजीवाद, साम्यवाद अथवा समाजवाद की विचारधारा उत्पन्न हुई।                  

पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन से जुड़ी सभी संपदाओं पर व्यक्ति विशेष का अधिकार हो जाता है । प्रकृति पर अधिकार करने की होड़ सी लग जाती है । आम जन का जीवन कुछ लोगों की दया पर निर्भर रहता है। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन की स्वतंत्रा लगभग समाप्त हो जाती है। समस्त व्यक्तियों और प्रकृति को उत्पादन के घटक के रूप में देखा जाता है।                    

   इसी प्रकार साम्यवादी व्यवस्था में समपूर्ण तंत्र पर किसी समूह विशेष का अधिकार हो जाता है। आम जन को श्रमिक समझा जाता है। सारे अधिकार शासन के हाथ में चले जाते हैं। व्यक्तिगत अधिकार सामाजिक बंटवारे के नाम पर समाप्त कर दिये जाते है। सामाजिक परम्पराओं का विरोध किया जाता है। प्राकृतिक संसाधनों को उत्पादन का साधन मात्र समझा जाता है। व्यक्तिगत अधिकारों तथा प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार के लिये संघर्ष उत्पन्न होता है ।   समाजवाद भी साम्यवाद के रंग से रंगा होता है किंतु इसका रंग कुछ फीका होता है । समाजवादी व्यवस्था में शासन पर जनता के द्वारा चुनें हुए प्रतिनिधियों का अधिकार होता है। सामान्यत: देखने पर लगता है कि जनता का शासन है परंतु नोकरशाही और राजनीति से जुड़े लोगों में व्यापक भ्रष्टाचार पाया जाता है। आम जनता को वैसे तो बहुत अधिकार होते हैं किंतु भ्रष्टाचार के कारण वह उन अधिकारों का उपभोग नहीं कर पाती। 

 किंतु भारत के संदर्भ में देखें तो पूंजीवाद, साम्यवाद और समाजवाद तीनो ही व्यवस्था सही प्रतीत नहीं होती । इन व्यवस्थाओं का कुछ ऐसा ही सार निकलता है कि प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार किया जाये और उनका अधिक से अधिक उपभोग किया जाये और व्यक्ति के प्रति यह भाव दिखता है कि ‘जो कमायेगा वही खायेगा’ किंतु भारतीय दर्शन कहता है कि “जो कमायेगा वही खिलायेगा और जो जन्मा है वह खायेगा’। भारत में एक व्यक्ति की कमाई पर पूरा परिवार पलता है जिसमें बच्चे, बूढ़े, स्त्रियों, अपाहिज सभी होते हैं। इन सभी की आवश्यकता पूरी करने के बाद जो शेष बचता है उससे ही वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है फिर भी कुछ शेष बचे तो दान-पुण्य के नाम पर लोकसंग्रह के कार्यों जैसे धर्मशाला, गौशाला, मंदिर,विद्यालय, कुओं के निर्माण तथा गरीबों को भोजन करवाने आदि कार्यों में लगा देता है।

  भारतीय घरों की रसोई में साधारणत: देखने को मिल जायेगा कि परिवार का भोजन बनने से पूर्व गाय, कुत्ते और चिड़िया के हिस्से का भोजन बनता है। यदि द्वार पर कोई भूखा आजाये तो उसको भी भोजन मिलता है।   भारतीय सामाजिक मूल्य ऐसे हैं कि कोई भी गरीब भूखा जाग तो सकता है किंतु वह भूखा सोना नहीं चाहिए । उसके भोजन और वस्त्र का प्रबंध समाज कर देता है। हमारे देश में कितने ही साधु -संत,बाब और भीखारी किसी भी प्रकार का कोई धनोपार्जन कार्य नहीं करते फिर भी जीवनयापन करते हैं।                              

विवाह जैसे नीजी फैसले भी परिवार तथा समाज तैय करता है और व्यक्ति उस रिश्ते को जीवनभर पूरी जिम्मेदारी के साथ निभाता है। विवाह जैसे खुशी के अवसर पर समस्त प्रियजनों को बुलाकर अपनी खुशियों में सहभागी बनाया जाता है। परिवार में मृत्यु जैसी दुखद घटना हो जाने पर दुख बंटाने प्रियजन तो आते ही हैं कितु वो लोग भी आते हैं जो अभी तक नाराज थे।        भारतीय किसान जब खेती करना प्रारंभ करता है तो खेत की भूमि को माता मानकर उसकी पूजा करता है तथा उससे प्रार्थना करता है कि “हे माँ पशु-पक्षियों के भाग्य का अन्न देना, हे माँ कीड़े-मकोड़ों के भाग्य का अन्न देना, हे माँ साधु-संतो के भाग्य का अन्न देना,अतिथियों के भाग्य का अन्न देना,शासन अच्छा चल सके इसलिए राजा जी के भाग्य का अन्न देना,अंत में,हे माँ मेरे और मेरे परिवार के भाग्य का अन्न देना ।इस प्रकार से एक सामान्य व्यक्ति भी खुद के कल्याण से पूर्व जगत कल्याण की कामना करता है । नदियों को हम भारतीय माता मानते हैं। नदियों के तट हमारे तीर्थ हैं जंहा जाकर हम मोक्ष की कामना करते हैं । वृक्षों में हम भारतीय देवताओं के दर्शन करते हैं । पशु-पक्षी हमारे देवताओं के वाहन है अथवा प्रतीक है। इन्हें हम बड़ी श्रद्धा से देखते हैं तथा पूजा करते हैं।                                                इस प्रकार देखें तो भारतीय समाज में कहीं भी संघर्ष देखने को नहीं मिलता,न तो व्यक्ति का व्यक्ति के साथ संघर्ष है और न ही व्यक्ति का प्रकृति के साथ । भारतीय जीवन पद्धति सहयोग और आस्था की जीवन पद्धति है। यह जीवन पद्धति प्रकृति और मानव पर अधिकार करने तथा उसका उपयोग अथवा उपभोग करने की इजाजत नहीं देती अपितु उनके प्रति कर्तव्य और आस्था निश्चित करती है। 

कालांतर में आये जात-पांत, ऊंच-नीच, छुआछूत जैसे सांस्कृतिक अपघटकों को यदि समाप्त कर दिया जाये तो भारतीय जीवन पद्धति में इतना सामर्थ्य है कि व्यक्ति और प्रकृति दोनो की ही सारसंभाल स्वयं कर सकती है।    

बचपन

  मीठे-मीठे बोल बोले,

  मिश्री का सा रस घोले, 

  

    कभी रूठे,

   कभी मन हर्षाये,

   

   कभी दिल को लगाये,

   कभी दिल भर आये,

   

   कभी गले लग जाये, 

       कभी रो के बतलाये ,

    

    कभी सहमे ,

 कभी खिलखिलाए ,
 

कभी प्यार बरसाये 

 कभी खूब सताये ,
 

पूरे-पूरे सपने देखे, 

 कभी सपनों में रम जाये ,

यह ही बचपन है जो सुख की नींद सुलाये ।