जिंदगी के दर्द को बताऊँ मैं कैसे,

जिंदगी के दर्द को बताऊँ मैं कैसे,
छलक पड़ते हैं आँसू, छुपाऊँ मैं कैसे।

सागर सी दुनिया के भवंर में धंसा मैं,
उलझन थी ऐसी, सुलझने मै फंसा मै।
छुपाता हूँ दर्द मगर छिपते नहीं आँसू,
खुद को छिपाते हैं,जब सताते हैं आँसू।

जिंदगी के दर्द को बताऊँ मैं कैसे,
छलक पड़ते हैं आँसू, छुपाऊँ मैं कैसे।

जलता दिल जैसे जलते हैं शोले ,                                         भेद दिलों के हम कैसे खोलें।                                          सुरज गवाह है, चाँद गवाह है,
वफा की है हमने, क्यों जमाना खफा है।

जिंदगी के दर्द को बताऊँ मैं कैसे,
छलक पड़ते हैं आँसू, छुपाऊँ मैं कैसे।

खोयी-खोयी मंजिले, धुंधले से रास्ते,
देखले ऐ-दिल हाल मेरा,है यही मेरे वास्ते।
जमाने की चौखट पर वफाएं भी रोयी,
सोगये सपने,निंदिया भी खोयी।

जिंदगी के दर्द को बताऊँ मैं कैसे,
छलक पड़ते हैं आँसू, छुपाऊँ मैं कैसे।

जमाने की ठोकर जब दिल पर लगी थी,
न रिश्ते दिखे थे, न मुहब्बत वहाँ थी।
सोती सी आशा, जगती निराशा,
दुआएँ करूँ मैं तो,मुझे लगती दुराशा।

जिंदगी के दर्द को बताऊँ मैं कैसे,
छलक पड़ते हैं आँसू, छुपाऊँ मैं कैसे।

“भाव’ जीवन आधार

धर्म और ईश्वर आस्था के विषय है और विज्ञान तर्क का। आस्था मन का विषय है और “मन’ बुद्धि से भिन्न है जो भावनाओं से निर्मित होता है। भावनाओं को विज्ञान की कसौटी पर परखा नहीं जा सकता इसी प्रकार ईश्वर और ईश्वर से जुड़ी मान्यताओं को भी वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा सकता।शास्त्रों में लिखा है कि ८४ लाख योनियों मे मनुष्य योनि श्रेष्ठ है,क्योंकि उसके पास विवेक है। मनुष्य ने अपने विवेक से समाज की रचना की और अपने जीवन को सुनिश्चित व सुरक्षित किया। सामाजिक रचना के मूल आधार विभिन्न सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते है जैसे माता-पिता, पुत्र-पुत्री, पति-पत्नी,भाई-बहन, चाचा, ताऊ,पडोसी,मौहल्ले, गाँव, बिरादरी के संबंध आदि। इसी प्रकार मानव का मानव के प्रति कर्तव्य सामाजिक संस्कार है। इन सामाजिक संस्कार और रिश्तों से ही दुख अथवा सुख की उत्पत्ति होती है। अगर परिवार और समाज के मूलधार को देखा जाये तो सभी जगह भाव ही दिखाई देंगे अर्थात् मानव जीवन का आधार भाव ही है। यदि मानव जीवन से भाव नष्ट कर दिये जाएँ तो सभी रिश्ते और सामाजिक संरचना समाप्त हो जाएंगें। मानव और पशु मे कोई अंतर ही नहीं रहेगा।                                                     ईश्वर और धर्म भी भाव प्रधान है। धर्म वह है जो ईश्वर की छायां मे चलता है अर्थात् शुभ और शुद्ध के आश्रय मे जीवन जीने की पद्धति ही धर्म है। धर्म ही लोक कल्याण के लिए प्रेरित करता है ।                         हम अक्सर देखते हैं कि मंदिरों अथवा धार्मिक स्थानों के आसपास अन्य स्थानो से अधिक भीखारी मिलते हैं। प्रश्न उठता है कि क्यों? जवाब है कि ज्यादातर आस्थावान लोग भी इन्हीं जगहों पर आते हैं। आस्थावान लोग ही दान-पुण्य करते है,जिससे भुखो को भोजन,वस्त्रादि जीवन की आवश्यक वस्तुएं मिल जाती है। हमे अपने आसपास देखने को मिलता है कि अनेकों धर्मशाला, निशुल्क भोजनालय, निशुल्क चिकित्सालय, अनाथालय, गौशालाएं, प्याऊ आदि ईश्वर या धर्म के नाम पर ही संचालित की जाती है। इसका कारण यह है कि ईश्वर और धर्म हमे लोक कल्याण के लिए प्रेरित करते हैं। यह प्रेरणा ही हमें सभ्य मानव बनाती है। अत: भाव,अनुभूति,विश्वास और आस्था ही मानव सभ्यता के आधार है ।                                               अंततः मै कहना चाहूंगा कि ईश्वर और धर्म को वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर प्रमाणित या अप्रमाणित नहीं किया जा सकता है। अनुभवों को,आस्थाओं को और भावनाओं को न तो नापा जा सकता है और न ही मापा जा सकता है और न ही इनका मोल है और न ही इनका तोल ।

दिल के गुलिस्ताँ

दुनिया की दिवारों में,सपनों के गुलिस्ताँ हैं।                           ख्वाइशों की कलियाँ हैं,उम्मीदों की खुशबू हैं॥

दर्द हो जब जख्मों में,फिर भी मुस्कुराना हैं।                        जख्मों से क्या डरना,अपने ही तो देते हैं॥

खुशियों की मंजिल की,दर्द भरी राहे हैं।                        हमसफर हम सा हो,राह कट जाना हैं॥

रंज क्या है अपनो से,दर्द भरे रिश्ते हैं।                                रूठे-रूठे रहते हो,झूठे-झूठे झगड़े हैं॥

वक्त के फेरों मे,जीवन बंध जाना हैं।                                 रिश्तों में बंधा जीवन,किश्तों में जीना हैं॥

घायल हो परिन्दे,फिर भी उड़ते जाते हैं।                           घायल हो मन जब,क्यों जीवन हार जाना हैं॥

दुनिया की दिवारों में,सपनों के गुलिस्ताँ हैं।                       ख्वाइशों की कलियाँ हैं,उम्मीदों की खुशबू हैं॥

“लीला”

जीवन में कुछ छोटी-छोटी घटनाएँ ऐसे घट जाती है कि जो जीवनभर की उठापटक में भी,मन के किसी कोने में छिपी हुई बैठ रहती है।समय का अदृश्य पंछी अपने पंखों में जीवन के,न जाने कितने ही किस्से,सपने और आशाओं को समेटता हुआ अनंत की ओर उड़ता जाता है। शेष रहती है तो यादें जो मन में परत-दर-परत जमा होती जाती है। ऐसी ही कुछ परतें मेरे मन में भी जमी हुई है जिनमें कहीं दबा हुआ है मेरा बचपन। 

    उन दिनों हम हमारे शहर बीकानेर के एक मौहल्ले हनुमानहत्थे में रहा करते थे। माँ रोज सुबह मुझे नहला-धुलाकर तैयार करती,आँखों में काजल डालती और मेरे माथे के दाहिनी ओर थोड़ा ऊपर की तरफ एक काला टीका लगादेती थी ताकि मुझे किसी की नज़र न लगे। फिर मेरे स्कूल के बस्ते में स्लेट और बर्ता रखकर मेरे टिफिन में मीठा पराठां रखती और टिफिन मेरे बस्ते में रखकर मुझे स्कूल छोड़ने जाती थी।

  मैं मौहल्ले की ही एक स्कूल में पढ़ता था। वह स्कूल एक बाड़े नूमा स्थान था, जंहा एक कोने में एक छप्पर था जो स्कूल का आफिस था। स्कूल में अनेक पेड़ थे, जिनकी छांव में कक्षाएं लगा करती थी। नीम के पेड़ के नीचे पाँचवीं तो खेजड़ी के नीचे छट्ठी कक्षा, शीशम के पेड़ के नीचे सातवीं और आठवीं कक्षा, व बेरी के नीचे तीसरी और चौथी कक्षा तथा बबूल के पेड़ के नीचे पहली और दूसरी कक्षाएं लगा करती थी। और बैठने के लिए दरी बिछाई जाती थी। मैं चौथी कक्षा का विद्यार्थी था। हम तीसरी-चौथी के विद्यार्थी अपने आप पर गर्व किया करते थे क्योंकि बेरी का पेड़ और उसकी छायां हमारे हिस्से में थी। जब बेर का मौसम आता तब हमारी कक्षा की छत हरे,पीले, लाल रसीले बेरों से लद जाती, जब रस और बढ़ जाता, तो वे रसीले बेर हमारी गोद में झरने लगते मानों ईश्वर अपना प्रसाद,सीधे ही आसमान से हमारी झोली में डाल रहे हैं। इस कारण अन्य कक्षाओं के छात्रों, हमारी कक्षा के छात्रों से ईर्ष्या करते थे। ईर्ष्या करते भी तो क्यों नही? जहां तक बस चलता,हम उन्हें हमारी बेरी के बेर खाने ही नहीं देते थे। बेर उन्हें दिखा-दिखा कर खाते थे और तरह-तरह का मुँह बनाकर उन्हें चिड़ाते थे,किंतु अंतमें अध्यापकों का हस्तक्षेप होता और बेर सभी में बराबर बांटने पड़ते। उस बेरी के पेड़, उसकी छायां और उसके फलों पर हम अपना एकाधिकार समझते थे।  जब नीम के पेड़ पर निम्बोली पकती तब पाँचवीं कक्षा के छात्र हमें नीम के पेड़ के पास से भी न गुजरने देते।   कुछ इसी तरह का व्यवहार छठी कक्षा के छात्रों का होता था, जब खेजड़ी पर सांगरियां पक कर पीली पड़ जाती थी। 

एक अद्भुत सा लगाव था हमें उन पेड़ों से,वो हमारी जीवंत कक्षाएं थी।

स्कूल पिछले हिस्से में बच्चों के लिये खेलने का मैदान था, उसके एक कोने कुछ झाडियाँ थी, जहाँ कुछ दिनों से एक कुतिया ने अपना घर बसाया था। जब आधी छुट्टी होती और हम अपना टिफिन निकालकर खाना खाने लगते,तो वो कुतिया टांगों में पूंछ दबाए,भोली सी सूरत बनाकर हमारे आसपास घूमने लग जाती, रोटी का टुकड़ा फेंकते ही उसे चट कर जाती और फिर ललचाई आँखों से हमें देखती रहती थी। चाहे किसी से उसे खाना मिले या न मिले या दुत्कार मिले किंतु उसकी आँखों में कृतज्ञता का ही भाव नज़र आता था। हमारी बाल मंडली ने कुछ ही दिनों में उसका नामकरण कर दिया। उसका नाम रखा गया “लीला’ जब हम खेलते तो वह हमारे बीच उच्छलती-कूदती, हमारे साथ दौड़ती। लीला को मुझसे कुछ ज्यादा ही लगाव हो गया,मैं उसे माँ के हाथ का बना आधा परांठा खाने को देता था। शायद माँ का वह प्रेम ही उसे मेरी तरफ खींच रहा था। जब मैं स्कूल आता वह सामने से दौड़कर आती,कभी मेरे पैरों को चाटती, तो कभी पिछले दोनों पैरों पर खड़ी होकर मेरे मूँह तक अपने मूँह को लाती। पूरी छुट्टी होने पर स्कूल की गली के नुक्कड़ तक वह मेरे पीछे आती थी, उससे आगे दूसरी गली के कुत्तों का साम्राज्य था, जहाँ से लीला का गुजरना नामुमकिन था।

एक दिन सुबह स्कूल पहूँचा तो लीला कहीं भी दिखाई नहीं दी। आधी छुट्टी तक एक बार भी नजरों के सामने नहीं आयी। मुझे और मेरी मित्रमंडली को उसकी चिंता हुई और हमने तय किया कि आधी छुट्टी में लीला को ढूँढा जाये। आधी छुट्टी में हम लीला को ढूँढने निकले तो सबसे पहले हम पीछे के मैदान में उस स्थान पर पहुँचे जँहा लीला रहती थी,वो स्थान था मैदान के एक कोने में उगी झाड़ियाँ। जब हम झाड़ियों के नजदीक पहुँचे तो “कूँ-कूँ’ की आवाज़ सुनाई दी, वह आवाज उन्हीं झाड़ियों में से आ रही थी,हम सहम गये,धीरे-धीरे बिना शोर किए हम झाड़ियों के और नजदीक पहूंचे,मैंने हिम्मत करके झाड़ियाँ हटाई और जो देखा,उससे हमारे आशचर्य और खुशी ठीकाना ही नहीं रहा। लीला अपने गुफा नुमा खड्डे में लेटी हुई थी और चार प्यारे-प्यारे, छोटे-छोटे पिल्ले उस पर उच्छल-कूद कर रहे थे। हम खुशी के मारे चिल्लाने लगे और पिल्लों को उठा लिया, उन से खेलने लगे तभी स्कूल के चपरासी “आसू जी’ दौड़ते हुए आए और डांटकर कहने लगे कि “बच्चों दूर भागो। कुतिया रात को ही ब्यायी है, इसके बच्चों को छेड़ोगे तो काटेगी । मैंने चौंक कर एक नजर लीला की ओर देखा। लीला की आँखों में किसी भी तरह का कोई विरोध या क्रोध नजर नहीं आया,वह अपने बच्चों को हमारे हाथों में देखकर सुरक्षित और आश्वस्त लग रही थी। परंतु आसू जी के आगे हमारी एक न चली। हमें पिल्लौं को वहीं छोड़कर जाना पड़ा। थोड़ी देर में जब आसू जी वंहा से चले गये तब हम अपने-अपने टिफिन से रोटी लेकर वहां वापस आगये और रोटियों को लीला के सामने रख दिया,लीला तुंरत उन रोटियाँ को खाने लगी और हम उसके बच्चों के साथ खेलने लगे तभी आधी छुट्टी समाप्ती की क्रूर घंटी बज उठी। हमे मन मारकर कक्षा में जाना पड़ा। अब यह क्रम नित्य शुरू हो गया, हम मौका मिलते ही लीला और उसके बच्चों के साथ खेलने लगते, कभी उनको गोद में लेते तो कभी उनके पीछे दौड़ते कभी इधर-उधर से ईंट पत्थर इकट्ठे कर उनके लिए घर बनाते। अब हम टिफिन में ज्यादा खाना लाने लगे थे, क्योंकि अब लीला के बच्चे ने भी रोटी खाना शुरू कर दिया था। अब लीला के बच्चे भी हमें देखते ही हमारी तरफ पूँछ हीलाते,झूमते और दौड़ते हुए आते, कभी हमारी पैंट अपने दाँतों से पकडते,तो कभी हमारे पैर चाटते। उनके साथ खेलते वक्त आसू जी का भय भी बना रहता, आसू जी जब डांटते तब हम दौड़कर कक्षा में आ जाते और आसू जी के वहाँ से हटते ही हम वापस लीला के बच्चों के साथ खेलने लग जाते थे। अब स्कूल में हमारा खाली समय लीला के आसपास ही बीतने लगा। 

समय का पहिया कब रूकने वाला था। कुछ ही दिनों में हमारी वार्षिक परीक्षा शुरू हो गई और कुछ ही दिनों में समाप्त हो गई। फिर शुरू हुई गर्मियों की “छुट्टियां’ जो सभी बच्चों के लिए मौज-मस्ती के दिन होते है, सो मैं कैसे पीछे रहता, मैं भी अपनी गली मुहल्ले के बच्चों के साथ खेलता, मौज-मस्ती करता।

अक्षय तृतीया हमारे शहर का स्थापना दिवस है इस के उपलक्ष्य में इस तिथि को हमारे शहर में पतंग उड़ाने का रीवाज है , सो मैंने भी इस दिन पतंग उड़ाने का भरपूर आनन्द लिया। अक्षय तृतीया के अगली ही शाम को मैं अपने परिवार के साथ अपने पुश्तैनी गाँव के लिये रवाना हो गया। गाँव में दादा-दादी,बुआ, चाचा का भरपूर स्नेह मिला। दूध-दही की कोई कमी नहीं थी हमारे घर में। दादी रोज मुझे अपने पास बैठाकर मक्खन खिलाती थी। चाचा ऊँट की सवारी करवाते। सारे दिन खेल-कूद के सिवाय और कुछ नज़र ही नहीं आता था। बड़े ही आनन्द से दिन गुजर रहे थे मेरे। इस तरह से कब छुट्टियां खत्म हो गई पता ही नहीं चला। अगले ही दिन हम बीकानेर के लीए रवाना हो गए और रात तक बीकानेर पहुंच गए। रात को सोते वक्त न जाने कहां से स्कूल की स्मृतियों ने आकर घेर लिया, स्कूल के पेड़, सहपाठी, अध्यापक, लीला और उसके बच्चे सभी याद आने लगे,उनके चहरे आँखों के सामने घूमने लगे। फिर न जाने कब आँख लग गई। अगले दिन सुबह माँ ने जल्दी उठा दिया और कहने लगी “आज नई कक्षा का पहला दिन है इसलिये जल्दी तैयार होकर समय से कुछ पहले ही स्कूल पहुंचना है’। माँ ने मुझे जल्दी ही तैयार कर दिया और स्कूल के दरवाजे तक मुझे छोड़कर वपिस लौट गई। जैसे ही मैंने स्कूल में पैर रखा,”मैं’ अचम्भित हो गया। दो महीनों की छुट्टियों में इतना परिवर्तन ! विकास की लहर अब हमारे स्कूल तक पहुँच चुकी थी, पुरानी कक्षाओं की जगह सीमेंट और ईंटों के नये भवन लगभग तैयार थे। वो पेड़ जो हमारी जीवित कक्षाएं थीं,काट दिये गए थे। सिर्फ नीम का एक पेड़ ही शेष बचा था,जो शायद आधुनिक निर्माण में कहीं बाधक नहीं रहा होगा। वह नये बने शौचालय के पीछे खड़ा ऐसे लग रहा था मानो किसी दुर्घटना में खत्म हुए परिवार का अकेला सदस्य बचा हो। 

 इस विकास के प्रवाह को देखकर मुझे लीला की चिंता होने लगी,मैंने तुरंत पीछे के मैदान में जाकर देखा,वंहा अब बास्केटबाल का कोर्ट बनगया था, “खो-खो’ के मैदान के लिए जमीन। समतल की जा रही थी। वहां लीला और उसके बच्चे दिखाई नहीं दिये, तभी आसू जी दिखाई दिये, “मैं ‘ दौड़कर उनके पास पहुंचा, मुझे देखकर वह मुस्कुराने लगे, मेरा प्रश्न वह पहले ही भांप गये थे। उनके निकट पहुँते ही वो बोले “बेटा उस कुत्ती और उसके बच्चों को ढूँढ रहे हो, अब वो तुझे नहीं मिलेगें, अभी कुछ दिनों पहले ही जब पीछे के मैदान का काम शुरू हुआ तब ठेकेदार के मजदूरों ने उस कुत्ती और उसके बच्चों को यहाँ से निकाल दिया। उस रात बारिश शुरू हुई तो रूकने का नाम ही नहीं ले रही थी। क्या नाम रखा था तूनें उस कुतिया का? हाँ,”लीला’। लीला गली में खड़े एक ट्रक के नीचे अपने बच्चों को लेकर घुस गई, शायद ट्रक के पहिये के आसपास ही कहीं रहे होंगे वो पिल्ले और कुतिया। देर रात कब ट्रक रवाना हुआ पता नहीं, कैसे वो कुतिया और उसका सारा परिवार ट्रक के चपेट आया इसका भी सही पता नहीं पर सुबह उनके कुचले हुए शरीरों को सड़क पर मैंने देखा था’। आसू जी की बात सुनकर मेरी आँखें सजल हो आई। मैं दौड़कर अपनी नई कक्षा के भवन में आ गया और एक कोने बैठ कर रोने लगा,तबतक मेरे अन्य सहपाठी भी स्कूल आचुके थे। सबने घेर कर मेरे रोने का कारण पूछा तो मैंने आसूजी से सुना वृतांत उन्हें कह डाला और उन सब की आँखें भी भर आई। 

 समय के साथ,विकास और आधुनिकता भी आवश्यक है,परंतु आधुनिकता और विकास के मार्ग पर न जाने कितने बेजुबानों की बली चढती है ,यह आज प्रत्यक्ष हुआ।

फूल मुस्कुराए

अक्सर बाज़ारों में, गलियों में, शहर में नालीयों के किनारे कुछ पौधे  देखने को मिल जाते हैं जो दिखने में मृत से,अपनी शोभा खोये हुए  से लगते है। परन्तु मौसम के अनुकूल होते ही, बसन्त के आने पर अपनी पूरी ताकत लगाकर खुद की शोभा संजोने का वे प्रयास करते हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी फूलों को मुस्कुराते हुए मैने देखा है। आपने भी जरूर देखा होगा। तो फिर हम भी विपरीत परिस्थितियों में इन पौधों से मुस्कुराना क्यों न सीखें।​

आधा यौवन

आधी-आधी रातें,                                                       आधे-आधे दिन।                                                      आधी-आधी बातें,                                                      आधे-आधे मन।।

आधी-आधी कलियाँ,                                                   आधे-आधे फूल।                                                      आधी-आधी खुशबू,                                                   आधे-आधे शूल।।

आधी-आधी खुशियां,                                                आधे-आधे गम।                                                      आधी-आधी आशा,                                                   आधे-आधे हम।।

आधी-आधी जिंदगी,                                                   आधे-आधे ख्वाब।                                                   आधी-आधी ख्वाहिशें,                                                आधे-आधे जवाब।।

आधी-आधी मंजिले,                                                   आधे-आधे रास्ते।                                                     आधी-आधी कोशिशें,                                                 आधे-आधे वास्ते।।

आधी-आधी राधा,                                                     आधे-आधे मोहन।                                                    आधी-आधी दिल्लगी,                                                आधे-आधे यौवन।।