सलामें वतन

सलामें वतन,तुझ पर वारे जाएं हम,
तुझ पर जान भी दे डालें, ये खाते कसम।

ओ खुशीयों के चमन,
यह कहता है मन,
तेरी धरती पर हो मेरे सो-सो जनम।
सलामें वतन,तुझ पर वारे जाएं हम,
तुझ पर जान भी दे डालें, ये खाते कसम।

शश्य श्यामल सा तन
गंगा सा तेरा मन
नज़रों में अमन,
सागर छूते कदम,
झूमे सारे मौसम
सलामें वतन,तुझ पर वारे जाएं हम,
तुझ पर जान भी दे डालें, ये खाते कसम।

आंचल में पले तेरे कितने धरम।
जुदा है जुबानें, जुदा है रसम,
जुदा है इबादत, जुदा है धरम
देखें तेरा चमन,हो जायें मगन,
फूलों की यहां हम है इतनी किसम।
सलामें वतन,तुझ पर वारे जाएं हम,
तुझ पर जान भी दे डालें, ये खाते कसम।

बलिदानों का रंग,
तीन रंगों का संग,
रंगों ऐसे ये रंग,
लगे माटी भी अंग,
घुले जीवन के संग
उठे मन में तरंग,
कि रंग ये बोले,
पहनो बसंती चोले।
सलामें वतन,तुझ पर वारे जाएं हम,
तुझ पर जान भी दे डालें, ये खाते कसम।

– अशोक जोशी

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अब नहीं होते जन आंदोलन

विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया को लोकतंत्र के चार प्रमुख स्तंभ माना जाता है। कहा जाता है कि किसी भी लोकतंत्र की सफलता और सततता के लिए जरूरी है कि उसके ये चारों स्तंभ मजबूत हों। इन्ही चारों स्तम्भो पर टिका है “लोकतंत्र’ , और लोकतंत्र की आत्मा का प्रकटिकरण होता है जन आंदोलनों से । वैसे भारत में जन आंदोलनों का इतिहास बहुत पुराना है। वर्तमान के संदर्भ में देखें तो 70 के दशक में भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ एक जन आंदोलन हुआ, परिणाम स्वरूप सरकार ने आपातकाल लगाया , इससे पूर्व और पश्चात भी अनेक जन आंदोलन हुए जिनका उद्देश्य राष्ट्र की अस्मिता को बचाये रखना और देश को मजबूत करना रहा था। इन आंदोलनों को उर्जा प्रदान करने का कार्य किया करते थे तत्तकालीन मीडिया (समाचार पत्र) ।
वर्तमान समय में देखें तो अन्ना के आंदोलन के सिवाय अन्य कोई ऐसा जन आंदोलन मुझे कहीं नहीं दिखाई दिया लेकिन इस आंदोलन से भी एक राजनैतिक पार्टी का जन्म हो गया और सत्ता भी हासिल हुई। वैसे देश में आंदोलन तो होते ही रहते हैं किन्तु उनका उद्देश्य समूह विशेष की व्यक्तिगत मांगों तक ही सीमित रहता है । लगता है वर्तमान समय में शायद देश की समस्त समस्याएं समाप्त हो गई है और किसी भी आंदोलन की आवश्यकता ही नहीं है। क्या वाकई किसी आंदोलन की आवश्यकता नहीं है? क्या वर्तमान मीडिया” लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ’, जनजागरण का प्रकाश स्तम्भ अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से निभा रहा हैं? क्या वर्तमान पत्र- पत्रिकाएं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व्यवसायी या विज्ञापन कम्पनीयां बन कर रह गई है ? या हम इतने स्वार्थी होगए हैं कि राष्ट्रीय चिंतन से सरोकार ही नहीं रखते? प्रश्न बहुत है , सोचना होगा।

रोहिंग्या परिवारों को भारत में शरण, कितना उचित ?

निसंदेह भारत एक विशाल और महान सांस्कृतिक विरासत युक्त देश है | सदियों से शरणागत को सुरक्षा और सम्मान देता आया है |
जब अंग्रेज भारत से गए,तब पीछे छोड़ कर गए गरीबी, बेरोजगारी,भूख और चरमराता आर्थिक ढांचा| आज 70 साल बाद भी देश इन्ही समस्याऔं का सामना कर रहा है| ऐसे में हजारों रोहिंगीया परिवारों को भारत में शरण देना और हमारे संसाधनो का प्रयोग करने देना कहां तक उचित होगा।

“पेट के खातिर’

  • कल ओफिस जाते वक्त रास्ते में देखा कि दो औरतें,एक दस -बारह साल की लड़की को लेकर सड़क के किनारे रस्सी पर चलनें का करतब दिखा रही थी। लड़की दोनो तरफ बाँस पर बंधी रस्सी पर चल रही थीऔर दोनों औरतें लोगो से पैसे मांग रही थी, और टेपरिकार्डर पर क्रांति फिल्म का गीत चल रहा था, “देख शमाशा उई, आजाएंगे जब अपनी पर तारों को तोड़ कर लाएंगे’ एसा ही कुछ स्पिकर पर बज रहा था। मैंने उनमें से एक औरत से पूछा यह तुम्हारी बच्ची है, उसने कहा” हां’। आगे मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने कहा, बाबू जी अब आप कहेगें कि इसको स्कूल क्यों नही भेजते और मेरा जवाब है “पेट के खातिर’। मैने पूछा तुमने कैसे जाना कि मैं यही प्रश्न करने वाला हूं । उसने जवाब दिया कि यही प्रश्न हम से हजारों बार होता है। तभी दूसरी औरत ने टेपरिकार्डर की आवाज तेज कर दी ,तब गाने की पंक्ति गायी जा रही थी “पर्वत को धूल बना देगें, सागर को बूंद बना देंगें, देख शमाशा उई’ ‘ मैं सोचने लगा क्या वाकई इनमें वो जज्बा है,जो इस गीत में गाया जा रहा है?
  • हाँ उनमें वो जज्बा है जो विपरीत परिस्थितियों से लड़ना सीखाए, तभी तो ये लोग ऐसे खेल दिखा देते हैं जिनमें मौत से आमना-सामना होता है।
  • दुनिया में लाखों लोग ऐसे होंगे जो जीवन जीने के लिए रोज मौत का खेल खेलते होंगे।वाकई ये लोग बाहदुर है जो अपनी बाहदुरी दिखाने के बाद भी याचक ही बने रहते है।

जिंदगी के दर्द को बताऊँ मैं कैसे,

जिंदगी के दर्द को बताऊँ मैं कैसे,
छलक पड़ते हैं आँसू, छुपाऊँ मैं कैसे।

सागर सी दुनिया के भवंर में धंसा मैं,
उलझन थी ऐसी, सुलझने मै फंसा मै।
छुपाता हूँ दर्द मगर छिपते नहीं आँसू,
खुद को छिपाते हैं,जब सताते हैं आँसू।

जिंदगी के दर्द को बताऊँ मैं कैसे,
छलक पड़ते हैं आँसू, छुपाऊँ मैं कैसे।

जलता दिल जैसे जलते हैं शोले , भेद दिलों के हम कैसे खोलें। सुरज गवाह है, चाँद गवाह है,
वफा की है हमने, क्यों जमाना खफा है।

जिंदगी के दर्द को बताऊँ मैं कैसे,
छलक पड़ते हैं आँसू, छुपाऊँ मैं कैसे।

खोयी-खोयी मंजिले, धुंधले से रास्ते,
देखले ऐ-दिल हाल मेरा,है यही मेरे वास्ते।
जमाने की चौखट पर वफाएं भी रोयी,
सो गये सपने,निंदिया भी खोयी।

जिंदगी के दर्द को बताऊँ मैं कैसे,
छलक पड़ते हैं आँसू, छुपाऊँ मैं कैसे।

जमाने की ठोकर जब दिल पर लगी थी,
न रिश्ते दिखे थे, न मुहब्बत वहाँ थी।
सोती सी आशा, जगती निराशा,
दुआएँ करूँ मैं तो,मुझे लगती दुराशा।

जिंदगी के दर्द को बताऊँ मैं कैसे,
छलक पड़ते हैं आँसू, छुपाऊँ मैं कैसे।

“भाव’ जीवन आधार

धर्म और ईश्वर आस्था के विषय है और विज्ञान तर्क का। आस्था मन का विषय है और “मन’ बुद्धि से भिन्न है जो भावनाओं से निर्मित होता है। भावनाओं को विज्ञान की कसौटी पर परखा नहीं जा सकता इसी प्रकार ईश्वर और ईश्वर से जुड़ी मान्यताओं को भी वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा सकता।शास्त्रों में लिखा है कि ८४ लाख योनियों मे मनुष्य योनि श्रेष्ठ है,क्योंकि उसके पास विवेक है। मनुष्य ने अपने विवेक से समाज की रचना की और अपने जीवन को सुनिश्चित व सुरक्षित किया। सामाजिक रचना के मूल आधार विभिन्न सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते है जैसे माता-पिता, पुत्र-पुत्री, पति-पत्नी,भाई-बहन, चाचा, ताऊ,पडोसी,मौहल्ले, गाँव, बिरादरी के संबंध आदि। इसी प्रकार मानव का मानव के प्रति कर्तव्य सामाजिक संस्कार है। इन सामाजिक संस्कार और रिश्तों से ही दुख अथवा सुख की उत्पत्ति होती है। अगर परिवार और समाज के मूलधार को देखा जाये तो सभी जगह भाव ही दिखाई देंगे अर्थात् मानव जीवन का आधार भाव ही है। यदि मानव जीवन से भाव नष्ट कर दिये जाएँ तो सभी रिश्ते और सामाजिक संरचना समाप्त हो जाएंगें। मानव और पशु मे कोई अंतर ही नहीं रहेगा। ईश्वर और धर्म भी भाव प्रधान है। धर्म वह है जो ईश्वर की छायां मे चलता है अर्थात् शुभ और शुद्ध के आश्रय मे जीवन जीने की पद्धति ही धर्म है। धर्म ही लोक कल्याण के लिए प्रेरित करता है । हम अक्सर देखते हैं कि मंदिरों अथवा धार्मिक स्थानों के आसपास अन्य स्थानो से अधिक भीखारी मिलते हैं। प्रश्न उठता है कि क्यों? जवाब है कि ज्यादातर आस्थावान लोग भी इन्हीं जगहों पर आते हैं। आस्थावान लोग ही दान-पुण्य करते है,जिससे भुखो को भोजन,वस्त्रादि जीवन की आवश्यक वस्तुएं मिल जाती है। हमे अपने आसपास देखने को मिलता है कि अनेकों धर्मशाला, निशुल्क भोजनालय, निशुल्क चिकित्सालय, अनाथालय, गौशालाएं, प्याऊ आदि ईश्वर या धर्म के नाम पर ही संचालित की जाती है। इसका कारण यह है कि ईश्वर और धर्म हमे लोक कल्याण के लिए प्रेरित करते हैं। यह प्रेरणा ही हमें सभ्य मानव बनाती है। अत: भाव,अनुभूति,विश्वास और आस्था ही मानव सभ्यता के आधार है । अंततः मै कहना चाहूंगा कि ईश्वर और धर्म को वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर प्रमाणित या अप्रमाणित नहीं किया जा सकता है। अनुभवों को,आस्थाओं को और भावनाओं को न तो नापा जा सकता है और न ही मापा जा सकता है और न ही इनका मोल है और न ही इनका तोल ।