जद, जातवाद र झगड़ै मांय, उळझ्यो बन्धु-समाज।

क्यों, जात-पांत रा सम्मेलन कराओ,हो “सरताज’?

काईं ? ईं सूं ही बण सी बात थारी, ईं सूं सर सी काज!

बळतै घर पर, रोटी सेको,आवै न थानै लाज।

सिद्धांता ने झोळ घाल्या, थे करनो चाहो राज !

(नोट-इस पोस्ट को राजनैतिक पार्टियों द्वारा आयोजित विभिन्न जातिय सम्मेलनों से जोड़ कर न देखा जाये)

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मुक्तक

चल रहा था देश में जब वाद, विवाद,तकरार,

झटपट टीवी चैनलों ने बिठाये छुटभैया चार,

खूब घसीटा मुद्दे को और खूब किया प्रचार,

खूब मिले थे विज्ञापन और खूब चला व्यापार।

फेसबुक के वीरों को भी, चढा दिमागी बुखार,

तिल को ताड़ बना डाला,उगला अपच बाहर।

सलामें वतन

सलामें वतन,तुझ पर वारे जाएं हम,
तुझ पर जान भी दे डालें, ये खाते कसम।

ओ खुशीयों के चमन,
यह कहता है मन,
तेरी धरती पर हो मेरे सो-सो जनम।
सलामें वतन,तुझ पर वारे जाएं हम,
तुझ पर जान भी दे डालें, ये खाते कसम।

शश्य श्यामल सा तन
गंगा सा तेरा मन
नज़रों में अमन,
सागर छूते कदम,
झूमे सारे मौसम
सलामें वतन,तुझ पर वारे जाएं हम,
तुझ पर जान भी दे डालें, ये खाते कसम।

आंचल में पले तेरे कितने धरम।
जुदा है जुबानें, जुदा है रसम,
जुदा है इबादत, जुदा है धरम
देखें तेरा चमन,हो जायें मगन,
फूलों की यहां हम है इतनी किसम।
सलामें वतन,तुझ पर वारे जाएं हम,
तुझ पर जान भी दे डालें, ये खाते कसम।

बलिदानों का रंग,
तीन रंगों का संग,
रंगों ऐसे ये रंग,
लगे माटी भी अंग,
घुले जीवन के संग
उठे मन में तरंग,
कि रंग ये बोले,
पहनो बसंती चोले।
सलामें वतन,तुझ पर वारे जाएं हम,
तुझ पर जान भी दे डालें, ये खाते कसम।

– अशोक जोशी

https://bnc.lt/o7Ye/dqHlKg4jFG

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।

आ गया है #भारतमेंनिर्मित #मूषक – इन्टरनेट पर भारत का अपना मंच ।
कसौटी आपके देश प्रेम की ।
जुड़ें और सशक्त करें अपनी भाषा और अपने भारत को ।

#मूषक – भारत का अपना सोशल नेटवर्क

जय हिन्द ।

अब नहीं होते जन आंदोलन

विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया को लोकतंत्र के चार प्रमुख स्तंभ माना जाता है। कहा जाता है कि किसी भी लोकतंत्र की सफलता और सततता के लिए जरूरी है कि उसके ये चारों स्तंभ मजबूत हों। इन्ही चारों स्तम्भो पर टिका है “लोकतंत्र’ , और लोकतंत्र की आत्मा का प्रकटिकरण होता है जन आंदोलनों से । वैसे भारत में जन आंदोलनों का इतिहास बहुत पुराना है। वर्तमान के संदर्भ में देखें तो 70 के दशक में भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ एक जन आंदोलन हुआ, परिणाम स्वरूप सरकार ने आपातकाल लगाया , इससे पूर्व और पश्चात भी अनेक जन आंदोलन हुए जिनका उद्देश्य राष्ट्र की अस्मिता को बचाये रखना और देश को मजबूत करना रहा था। इन आंदोलनों को उर्जा प्रदान करने का कार्य किया करते थे तत्तकालीन मीडिया (समाचार पत्र) ।
वर्तमान समय में देखें तो अन्ना के आंदोलन के सिवाय अन्य कोई ऐसा जन आंदोलन मुझे कहीं नहीं दिखाई दिया लेकिन इस आंदोलन से भी एक राजनैतिक पार्टी का जन्म हो गया और सत्ता भी हासिल हुई। वैसे देश में आंदोलन तो होते ही रहते हैं किन्तु उनका उद्देश्य समूह विशेष की व्यक्तिगत मांगों तक ही सीमित रहता है । लगता है वर्तमान समय में शायद देश की समस्त समस्याएं समाप्त हो गई है और किसी भी आंदोलन की आवश्यकता ही नहीं है। क्या वाकई किसी आंदोलन की आवश्यकता नहीं है? क्या वर्तमान मीडिया” लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ’, जनजागरण का प्रकाश स्तम्भ अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से निभा रहा हैं? क्या वर्तमान पत्र- पत्रिकाएं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व्यवसायी या विज्ञापन कम्पनीयां बन कर रह गई है ? या हम इतने स्वार्थी होगए हैं कि राष्ट्रीय चिंतन से सरोकार ही नहीं रखते? प्रश्न बहुत है , सोचना होगा।