बात ऒर संयम

किसी भी बात को निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिये संयम आवश्यक है। इसको समझने के लिए बात ऒर संयम को अलग-अलग समझना पड़ेगा । बात का अर्थ मेरी दृष्टि से लौकिक व्यवहार,अपने भावों ऒर अपने दृष्टिकोण को शब्द देना है। संयम का अर्थ है स्वयं पर नियंत्रण। बातचीत में संयम का अर्थ है अनावश्यक न बोला जाये, सार्थक बोला जाये,किसी की भावना को ठेस न पहुंचे ऐसा बोला जाये,न आवेग में बोला जाये न उद्वेग में बोला जाये,देश-काल- परिस्थिति के अनुसार हृदयस्पर्शी तथा जिससे बात की जा रही है ,उसके भावावेग को समझकर बोला जाये।संयम का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि कम बोला जाये अथवा बातचीत बंद कर दी जाये इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि सामने वाले की हां मे हां मिलाई जाये अथवा गलत का प्रतिरोध न किया जाये। इसके स्थान पर जिससे बातचीत की जा रही है उसके भावों को नियंत्रित कर अपनी बात कही जाये। जिस प्रकार महाभारत में श्री कृष्ण,हर परिस्थिति में एक ही भाव में नजर आते हैं। स्थिर,प्रज्ञ ऒर मुस्कुराते हुए ही नजर आते हैं। महाभारत के युद्ध में कृष्ण के परिवार के भी अनेक लोग मारे गये यहाँ तक की उनका प्रिय भानजा अभिमन्यु, जो उन्ही की गोद में पला-बढा वह उनका शिष्य भी था,जिसे कॊरवों ने धोखे से मारा। फिर भी कृष्ण विचलित नहीं हुए। वही स्थिर,प्रज्ञ भाव से मुस्कुराते हुए नजर आते हैं। वास्तव अद्भुत संयमित व्यक्तित्व हैं श्री कृष्ण का। जब कुरुक्षेत्र में युद्ध प्रारम्भ होने वाला था ऒर अर्जुन कर्तव्य से विमुख हो संशयग्रस्त हो गये तब श्री कृष्ण ने अर्जुन के भावों को समझकर बातचीत प्रारम्भ की, वो बातचीत गीता का ज्ञान बनकर प्रकट हुई। उस ज्ञान ने तब अर्जुन को मार्ग दिखलाया ऒर तब से अब तक वह ज्ञान पूरे संसार को मार्ग दिखला रहा है। श्री कृष्ण के जो मुख पर था वही व्यवहार में था। कृष्ण-अर्जुन के संवाद की बात करते वक्त मुझे अपने मित्र अर्जुन दास जी से कुछ दिन पूर्व हुई बातचीत याद आगयी। यहाँ उसका जिक्र करना प्रासंगिक होगा। अर्जुन दास जी से मेरा सम्पर्क काफी पुराना है। अभी पन्द्रह – बीस दिन पहले उन से मुलाकात हुई थी। चीन ने जो गलवान घाटी में किया उससे बहुत शुब्ध नजर आ रहे थे , बातचीत प्रारम्भ हुई दुआ – सलाम से फिर एक-दूसरे की कुशल- क्षेम पूछी,कछ इधर-उधर की बातचीत हुई । फिर विषय आया भारत – चीन सीमा विवाद का । इस पर मेरे मित्र खूब बोले, भारत में चीन की घुसपैठ,गलवान घाटी की स्थिति को उन्होंने विस्तार से बताया। ऐसे समय में भारत सरकार को क्या करना चाहिए, भारतीय सेना को गलवान घाटी में किस प्रकार व्यूह रचना करनी चाहिए,उन्हो ने बातों ही बातों मे पूरा ब्लू प्रिन्ट खींच दिया। देश भक्ति की भावना अपने पूरे उफान पर थी। नागरिकों के कर्तव्य के विषय में उन्होंने कहा कि अगर चीन की कमर तोड़नी है तो उसके व्यापार पर चोट करनी होगी, चीनी वस्तुओं का हमें बहिष्कार करना होगा तभी हम चीन को पीछे हटने के लिए मजबूर कर सकते। अंत में पुनः एक-दूसरे के कुशल -क्षेम की कामना करते हुए अपने-अपने रास्ते हो लिए। अभी तीन – चार दिन पहले एक इलेक्ट्रॉनिक की दूकान पर पुनः उनसे मिलना हो गया,वे एक हेडफोन खरीद रहे थे । मैने उनके हाथ में लिए हुए हेडफोन पर लगी चिट की ओर उनका ध्यान आकर्षित किया, जिस पर लिखा था मेड इन चाईना। अब अर्जुन दास जी का जवाब था अन्य हेडफोन से यह 70 रूपये सस्ता है । वह कहने लगे भारतीय कम्पनियों को भी सस्ता ऒर अच्छा समान बनाना चाहिए तभी हम चीनी समान को भारत से बाहर कर पायेंगे । इस विषय पर मैने उनसे क्या कहा यदि लिखने बैठा तो मूल विषय से दूर चला जाऊंगा । खैर अजब-गजब व्यक्तित्व के धनी मित्र अर्जुन दास जी का संयम मात्र 70 रूपये में धरशायी हो गया। अंत में कहना चाहुंगा कि सोच समझकर बोलना चाहिए ऒर जो बोला है वो किया जाये, यदि वैसा किया न जा सके तो उस मार्ग पथिक बनकर सदैव रहना चाहिए। बातचीत में सयंम व्यक्तित्व को निखारता है,आकर्षक बनाता है। व्यक्ति को यदि ज्यादा ज्ञान न हो, तो भी उसे बार-बार लज्जित होने से बचाता हे। मेरी दृष्टि से बातचीत में संयम व्यक्ति के व्यक्तित्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

वक्त

वक्त रुकता नहीं’ लोग कहते हैं।

वक्त गुजरता नहीं, कभी इंतज़ार करके देखिये ।

दर्द गहरा हो तो वक्त कटता नहीं।

वक्त जल्द ही गुजर जाता है, लोग कहते हैं।

अकेले में, तन्हा रातो में, दुख के बादल जब गहरे हो, वक्त क्या खूब शोर मचाता है।

वक्त बे जुबान है, लोग कहते हैं।

जवानी से बुढापे की ओर जाते हुए लोगों के चहरे तो देखिये वक्त के कितने ही चेहरे नजर आ जाते हैं।

वक्त का कोई चेहरा नहीं है,लोग कहते हैं।

बच्चपन में,बच्चों की किलकारीयों में वक्त आनंद ऒर प्रेम बरसाता है।

वक्त तो शुन्य है,लोग कहते हैं।

किस्मत की झांकीयों को थोड़ा करीब से देखिये,कभी सुख,कभी दुःख, लॊट कर आते हैं।

वक्त लॊटता नहीं, लोग कहते हैं।

जद, जातवाद र झगड़ै मांय, उळझ्यो बन्धु-समाज।

क्यों, जात-पांत रा सम्मेलन कराओ,हो “सरताज’?

काईं ? ईं सूं ही बण सी बात थारी, ईं सूं सर सी काज!

बळतै घर पर, रोटी सेको,आवै न थानै लाज।

सिद्धांता ने झोळ घाल्या, थे करनो चाहो राज !

(नोट-इस पोस्ट को राजनैतिक पार्टियों द्वारा आयोजित विभिन्न जातिय सम्मेलनों से जोड़ कर न देखा जाये)

मुक्तक

चल रहा था देश में जब वाद, विवाद,तकरार,

झटपट टीवी चैनलों ने बिठाये छुटभैया चार,

खूब घसीटा मुद्दे को और खूब किया प्रचार,

खूब मिले थे विज्ञापन और खूब चला व्यापार।

फेसबुक के वीरों को भी, चढा दिमागी बुखार,

तिल को ताड़ बना डाला,उगला अपच बाहर।

सलामें वतन

सलामें वतन,तुझ पर वारे जाएं हम,
तुझ पर जान भी दे डालें, ये खाते कसम।

ओ खुशीयों के चमन,
यह कहता है मन,
तेरी धरती पर हो मेरे सो-सो जनम।
सलामें वतन,तुझ पर वारे जाएं हम,
तुझ पर जान भी दे डालें, ये खाते कसम।

शश्य श्यामल सा तन
गंगा सा तेरा मन
नज़रों में अमन,
सागर छूते कदम,
झूमे सारे मौसम
सलामें वतन,तुझ पर वारे जाएं हम,
तुझ पर जान भी दे डालें, ये खाते कसम।

आंचल में पले तेरे कितने धरम।
जुदा है जुबानें, जुदा है रसम,
जुदा है इबादत, जुदा है धरम
देखें तेरा चमन,हो जायें मगन,
फूलों की यहां हम है इतनी किसम।
सलामें वतन,तुझ पर वारे जाएं हम,
तुझ पर जान भी दे डालें, ये खाते कसम।

बलिदानों का रंग,
तीन रंगों का संग,
रंगों ऐसे ये रंग,
लगे माटी भी अंग,
घुले जीवन के संग
उठे मन में तरंग,
कि रंग ये बोले,
पहनो बसंती चोले।
सलामें वतन,तुझ पर वारे जाएं हम,
तुझ पर जान भी दे डालें, ये खाते कसम।

– अशोक जोशी

https://bnc.lt/o7Ye/dqHlKg4jFG

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।

आ गया है #भारतमेंनिर्मित #मूषक – इन्टरनेट पर भारत का अपना मंच ।
कसौटी आपके देश प्रेम की ।
जुड़ें और सशक्त करें अपनी भाषा और अपने भारत को ।

#मूषक – भारत का अपना सोशल नेटवर्क

जय हिन्द ।

अब नहीं होते जन आंदोलन

विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया को लोकतंत्र के चार प्रमुख स्तंभ माना जाता है। कहा जाता है कि किसी भी लोकतंत्र की सफलता और सततता के लिए जरूरी है कि उसके ये चारों स्तंभ मजबूत हों। इन्ही चारों स्तम्भो पर टिका है “लोकतंत्र’ , और लोकतंत्र की आत्मा का प्रकटिकरण होता है जन आंदोलनों से । वैसे भारत में जन आंदोलनों का इतिहास बहुत पुराना है। वर्तमान के संदर्भ में देखें तो 70 के दशक में भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ एक जन आंदोलन हुआ, परिणाम स्वरूप सरकार ने आपातकाल लगाया , इससे पूर्व और पश्चात भी अनेक जन आंदोलन हुए जिनका उद्देश्य राष्ट्र की अस्मिता को बचाये रखना और देश को मजबूत करना रहा था। इन आंदोलनों को उर्जा प्रदान करने का कार्य किया करते थे तत्तकालीन मीडिया (समाचार पत्र) ।
वर्तमान समय में देखें तो अन्ना के आंदोलन के सिवाय अन्य कोई ऐसा जन आंदोलन मुझे कहीं नहीं दिखाई दिया लेकिन इस आंदोलन से भी एक राजनैतिक पार्टी का जन्म हो गया और सत्ता भी हासिल हुई। वैसे देश में आंदोलन तो होते ही रहते हैं किन्तु उनका उद्देश्य समूह विशेष की व्यक्तिगत मांगों तक ही सीमित रहता है । लगता है वर्तमान समय में शायद देश की समस्त समस्याएं समाप्त हो गई है और किसी भी आंदोलन की आवश्यकता ही नहीं है। क्या वाकई किसी आंदोलन की आवश्यकता नहीं है? क्या वर्तमान मीडिया” लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ’, जनजागरण का प्रकाश स्तम्भ अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से निभा रहा हैं? क्या वर्तमान पत्र- पत्रिकाएं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व्यवसायी या विज्ञापन कम्पनीयां बन कर रह गई है ? या हम इतने स्वार्थी होगए हैं कि राष्ट्रीय चिंतन से सरोकार ही नहीं रखते? प्रश्न बहुत है , सोचना होगा।

रोहिंग्या परिवारों को भारत में शरण, कितना उचित ?

निसंदेह भारत एक विशाल और महान सांस्कृतिक विरासत युक्त देश है | सदियों से शरणागत को सुरक्षा और सम्मान देता आया है |
जब अंग्रेज भारत से गए,तब पीछे छोड़ कर गए गरीबी, बेरोजगारी,भूख और चरमराता आर्थिक ढांचा| आज 70 साल बाद भी देश इन्ही समस्याऔं का सामना कर रहा है| ऐसे में हजारों रोहिंगीया परिवारों को भारत में शरण देना और हमारे संसाधनो का प्रयोग करने देना कहां तक उचित होगा।